NATIONAL FOOD SECURITY ACT,2013 FULL TEXT

केन्द्र सरकार की मजदूर विरोधी नीति के खिलाफ (1 मर्इ से 7 मर्इ 2015 तक विरोध सप्ताह)




 प्रेस विज्ञप्ति 

केन्द्र सरकार की मजदूर विरोधी नीति के खिलाफ 1 मर्इ से 7 मर्इ 2015 तक विरोध सप्ताह
पटना, 30 अप्रैल, 2015

भोजन का अधिकार अभियान द्वारा देश के पूर्वी राज्यों- बिहार, झारखण्ड, प. बंगाल, छत्तीसगढ़, उड़ीसा में 1 मर्इ से 7 मर्इ तक केन्द्र की जन विरोधी नीतियों के विरोध में प्रतिरोध सप्ताह मनाया जा रहा है। इस अभियान में विभिन्न संगठन अपने बैनर के साथ शामिल हो रहे हैं।

बिहार के साथियों एवं संगठन के प्रतिनिधियों से अपील की जाती है कि 1 मर्इ मजदूर दिवस के अवसर पर एकजूट हों और अपने-अपने कार्यक्रमों के माध्यम से केन्द्र सरकार के मजदूर विरोधी नीतियों के खिलाफ आवाज़ बुलंद करें।

वर्ष 1886 में अमेरिका के हेमार्केट में अपने आठ घंटे की कार्यावधी की मांगे के लिए हड़ताल कर रहे मजदूरों की पुलिस द्वारा अंधाधुन फायरिंग कर उनकी हत्या की गर्इ। इस घटना के सवा सौ साल बाद भी मजदूर अपने हक के लिए लाठी-गोली खा रहे हैं। विभिन्न कानूनों के माध्यम से उन पर दमन जारी है। 

भाजपा नेतृत्व वाली केन्द्र सरकार की नीतियाँ मजदूर विरोधी हैं। जिस प्रकार सरकार नीजी क्षेत्र को प्राकृतिक संसाधनों को लूट की अनुमति, भूमि अधिग्रहण तथा पुंजीपतियों को कर में छूट तथा सार्वजनिक क्षेत्र में निवेष में कटौती कर रही है उससे बेरोजगारी में वृद्धि होगी। बढ़ती आर्थिक विषमता से समाजिक असंतोष में वृद्धि होगी।

लगातार जन संघर्षों के बाद मजदूरों के हित में जो आधे-अधूरे नीतियाँ बनी उन्हें भी वर्तमान सरकार बदलना चाहती है। राजस्थान की भाजपा सरकार ने सर्वप्रथम मजदूरों के हित वाले कानून में नकारात्मक बदलाव किया है। इंडस्ट्रीयल डिस्प्यूट एक्ट के अंतर्गत 300 मजदूर क्षमता वाली कंपनियां बिना सरकार की अनुमति के कंपनी बंद कर मजदूरों का हटा सकती है। इसी आधार पर केन्द्र सरकार स्माल फैक्ट्री (रेगूलेषन आफ इम्प्लायमेन्ट एण्ड कंडीषन आफ सर्वीस) बिल 2014 ला रही है। इसके तहत द फैक्ट्री एक्ट, 1947, द इंडस्ट्रीयल इम्प्लायमेंट (स्टैडिंग आर्डर) एक्ट 1946, न्यूनतम मजदूरी कानून 1948, मजदूरी भुगतान कानून 1936, बोनस भुगतान कानून 1965, द इम्प्लार्इ स्टेट इंसुरेंस एक्ट 1948, द इम्प्लार्इ प्रोविडेंट फंड एण्ड मिसलेनियस प्रोविसन एक्ट 1952, मातृत्व लाभ कानून 1961, द इम्प्लार्इ कम्पेनसेषन एक्ट 1923, द इंटर स्टेट मार्इग्रेंट वर्कमेन (रेगुलेषन आफ इम्प्लायमेन्ट एण्ड कंडीषन आफ सर्वीस) एक्ट 1979, (राज्य) शाप एण्ड इस्टैबलीषमेन्ट एक्ट, द इक्वल रेमुनरेषन एक्ट 1976, द चार्इल्ड लेबर (प्रोहिबिषन एण्ड रेगुलेषन) एक्ट 1986 आयेंगे। ये सारे कानून उन फैक्ट्रीयों में नहीं लागू होंगे जहां 40 से कम मजदूर काम करते हैं।  अत: आज के जमाने में जहां टेक्नोलाजी का सहारा अधिक लिया जाता है वहां इन कानूनों के नहीं लागू होने से मजदूरों का अहित होगा।

बुष-मनमोहन परमााणु करार का भाजपा ने विरोध किया था परन्तु वर्तमान मोदी सरकार ने पहले से ही कमजोर परमाणु दायित्व विधेयक के सेक्षन 17 और सेक्षन 46 को नजरअंदाज करते हुये परमाणु करार पर मुहर लगा दी। इस कारार के अनुसार कोर्इ हादसा होने पर परमाणु रिएक्टर आपूर्तिकर्ता कंपनियां जिम्मेदार नहीं होंगी।

मनरेगा जैसे रोजगारपरक योजनाओं में पिछले वर्ष 2014-15 में 34000 करोड़ रुपये को भी पुरा खर्च नहीं किया जा सका। वर्तमान वितितय वर्ष 2015-16 में भी इतनी राषी ही तय की गर्इ है। इसमें पिछला बकाया शामिल नहीं है। पिछले वर्ष जिन मजदूरों का मजदूरी बकाया था तथा जो योजना अधूरा इन्हें पूरा नहीं किया जा सकेगा। यदि बढ़ती महंगार्इ, बकाया और कार्य मांग के आधार पर हिसाब लगाया जाए तो मनरेगा के लिए कम-से-कम 45000 करोड़ रुपये होना चाहिए। 

केन्द्र द्वारा ग्रामीण विकास विभाग, शहरी विकास विभाग, कृषि आदि की बजट में 20 प्रतिषत तक की कटौती किया जा रहा है। इससे मनरेगा तथा अन्य कल्याणकारी योजनाओं का क्रियान्वयन प्रभावित हो रहा है। श्रम आधारित कार्यक्रम मनरेगा में कटौती से ग्रामीण क्षेत्र के गरीब मजदूरों का अहित और ठेकेदारों को फायदा होगा। मनरेगा में श्रम-सामाग्री अनुपात को 60:40 की जगह 51:49 करने की बात की जा रही है। इस कार्यक्रम के तहत पंचायतों के विकास की योजनाओं के लिये देष भर में लगभग 30000 करोड़ रुपये बैठती है। वर्ष 2015-16 के बजट में मनरेगा के बजट में भारी कटौती की संभावना है साथ ही मनरेगा की की कवरेज भी कम करने की योजना बनायी जा रही है। ऐसा करने से महिलाओं, अनुसूचित जाति, जनजाति को नुकसान तो होगा ही खेती की उत्पादकता में भी कमी आएगी। 

ज़रा मनरेगा की उपलबिधयों पर गौर फरमाते हैं। वर्ष 2008-09 से 2013 तक ग्रामीण विकास मंत्रालय के अनुसार लगभग साढ़चार करोड़ से लेकर साढ़े पांच करोड़ तक गरीब ग्रामीण परिवारों को रोजगार मिला। यानी देष की कुल ग्रामीण परिवारों का लगभग 30 प्रतिषत। रोजगार पाने वालों में लगभग आधी संख्या महिलाओं की थी और कुल संख्या का पांचवा हिस्सा अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों का था। 

इसके अलावे मनरेगा के और भी अन्य फायदे हुये हैं। जैसे- लगभग 2.5 अरब मानव-दिवस का मौसमी रोजगार प्रति वर्ष सृजित कर ग्रामीण इलाकों में छिपी हुर्इ बेरोजगारी या अंष-रोजगार (6.66 अरब मानव-दिवस) की समस्या लगभग 41 प्रतिषत हल हुर्इ। जहां-जहां सही अमल हुआ, वहां मनरेगा की वजह से ग्रामीण इलाकों से मजबूरन पलायन कम हुआ। मनरेगा की आमदनी से ग्रामीणों का क्रय शकित बढ़ने से गांवों में उपभोक्ता वस्तुओं की मांग में वृद्धि हुर्इ। ग्रामीण महिलाओं के हाथों में पैसा आने से उनके कुपोषण की समस्या पर थोड़ा असर पड़ा।

षिक्षा व स्वास्थ्य जैसे सार्वजनिक मदों के खर्चे में कटौती कर नीजीकरण को बढ़ावा दे रही है। विŸािय वर्ष 2014-15 की तुलना में विŸािय वर्ष 2015-16 के बजट में सर्वषिक्षा अभियान में 28258 करोड़ से घटाकर 22000 करोड़ (लगभग 22 प्रतिषत), मध्याहन भोजन योजना में 13215 करोड़ से घटाकर 8900 करोड़ (लगभग 33 प्रतिषत), राष्ट्रीय माध्यमिक षिक्षा अभियान में 5000 करोड़ से घटाकर 3565 करोड़ (लगभग 29 प्रतिषत), समेकित बाल विकास सेवाओं में 18691 करोड़ से घटाकर 8754 करोड़ (लगभग 53 प्रतिषत), राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिषन में 21912 करोड़ से घटाकर 18000 (लगभग 17 प्रतिषत), राष्ट्रीय कृषि विकास योजना में 9954 करोड़ से घटाकर 4500 करोड़ (लगभग 55 प्रतिषत) रुपये की भारी कटौती की गर्इ है। (स्रोत: यूनियन बजट)

केन्द्र सरकार द्वारा गठित शांता कुमार समिति ने अपनी रिपोर्ट में अनुसंषा की है कि किसानों से अनाज का सीमित उठाव करना चाहिये। इससे किसानों को नुकसान होगा। कमीटी की रिपोर्ट के अनुसार एपीएल-बीपीएल को फिर से आधार बनाकर राषन वितरण किया जाना चाहिये। इसमें अन्त्योदया के लाभार्थी को छोड़कर शेष लाभार्थियों को खाधान्न मूल्य में वृद्धि करते हुये न्यूनतम समर्थन मूल्य के आधे मूल्य पर राषन देने की सिफारिष की गर्इ है। इसके अलावा कमीटी ने खाध सुरक्षा कानून के तहत लाभार्थियों की संख्या को 67 प्रतिषत से घटाकर 45 प्रतिषत करने की बात की है। यदि ऐसा होता है तो बड़ी संख्या में मजदूर और छोटे किसान खाध सुरक्षा के लाभ से वंचित हो जायेंगे। 

वर्तमान समय में मजदूरों को सम्मानजनक मजदूरी नहीं मिल पाता है। महंगार्इ और कर्ज की मार से गरीब, किसान आत्महत्या को मजबूर हैं। ऐसी सिथति में केन्द्र सरकार इनके मूंह से निवाला छिनने का प्रयास कर रही है। 

सरकार राजस्व प्रापित के स्रोतों व राजस्व दरों में वृद्धि के बजाए गरीबों के योजनाओं में कटौती कर रही है। सरकार कारपोरेट क्षेत्र तथा पूंजीपती घरानों को टैक्स में भारी छूट दे रही है। वर्ष 2013-14 में टैक्स छूट 5,49,984.1 करोड़ थी जो बढ़कर वर्ष 2014-15 में 5,89,285.2 करोड़ हो गर्इ। एक अनुमान के अनुसार यह कर माफी कुल कर राजस्व का 43.2 प्रतिषत है। 

हमारे देष में प्रत्यक्ष कर में अप्रत्यक्ष कर के मुकाबले लगातार कमी आ रही है। 100 रुपये में 30 रुपये प्रत्यक्ष कर से जबकि 70 रुपये अप्रत्यक्ष कर से प्राप्त होता है। प्रत्यक्ष कर सकल घरेलु उत्पाद के अनुपात में वर्ष 2009-10 से ठहर गर्इ है जबकि अप्रत्यक्ष कर लगातार बढ़ रहा है। अप्रत्यक्ष कर के माध्यम से आम जनता से राजस्व इकटठा किया जाता है। इसके बावजूद उनके हित वाले योजना की राषि में कटौती की जा रही है। इसी कारण मंदी के बावजूद उपभोक्ता सामानों के दामों में अप्रत्याषित वृद्धि हुर्इ है।

केन्द्र सरकार ने भूमि अधिग्रहण कानून 2013 का संषोधन के लिये भूमि अधिग्रहण अध्यादेष 2014 लाया गया है। इसके दबाव में तत्कालीन सरकार ने अंग्रेजों द्वारा बनाए गये दमनकारी 1894 के लगभग सवा सौ साल पश्चात लंबे संघर्षों के बाद 2013 में भूमि अधिग्रहण कानून बनाया (इसके समर्थम में भाजपा सांसदों ने भी वोट किया था) जिसमें किसानों की सहमति, सामाजिक असर मूल्यांकन, पुनर्वास-मुआवजे का सिद्धांत स्थापित किया था। वर्तमान सरकार ने इसे तोड़मरोड़ कर बरबाद कर दिया। 


भोजन का अधिकार अभियान (बिहार)
लोक परिषद, बिहार दलित अधिकार मंच (बिहार), एकता परिषद, जन स्वास्थ्य अभियान, बिहार प्रोग्रेसिव एलाएंस, बिहार विमेन्स नेटवर्क, बिहार महिला समाज, झुग्गी-झोपड़ी संघर्ष मोर्चा, लोक समिति, साझी आवाज, सी.ए.सी.एल., जन जागरण शकित संगठन, जल जमाव विरोधी संघर्ष समिति, एन.ए.पी.एम., मुसहर विकास मंच, बिहार वालंटरी फोरम फार एजुकेषन।

केन्द्र सरकार की मजदूर विरोधी नीति के खिलाफ (1 मर्इ से 7 मर्इ 2015 तक विरोध सप्ताह)


 प्रेस विज्ञप्ति 

केन्द्र सरकार की मजदूर विरोधी नीति के खिलाफ 1 मर्इ से 7 मर्इ 2015 तक विरोध सप्ताह
पटना, 30 अप्रैल, 2015

भोजन का अधिकार अभियान द्वारा देश के पूर्वी राज्यों- बिहार, झारखण्ड, प. बंगाल, छत्तीसगढ़, उड़ीसा में 1 मर्इ से 7 मर्इ तक केन्द्र की जन विरोधी नीतियों के विरोध में प्रतिरोध सप्ताह मनाया जा रहा है। इस अभियान में विभिन्न संगठन अपने बैनर के साथ शामिल हो रहे हैं।

बिहार के साथियों एवं संगठन के प्रतिनिधियों से अपील की जाती है कि 1 मर्इ मजदूर दिवस के अवसर पर एकजूट हों और अपने-अपने कार्यक्रमों के माध्यम से केन्द्र सरकार के मजदूर विरोधी नीतियों के खिलाफ आवाज़ बुलंद करें।

वर्ष 1886 में अमेरिका के हेमार्केट में अपने आठ घंटे की कार्यावधी की मांगे के लिए हड़ताल कर रहे मजदूरों की पुलिस द्वारा अंधाधुन फायरिंग कर उनकी हत्या की गर्इ। इस घटना के सवा सौ साल बाद भी मजदूर अपने हक के लिए लाठी-गोली खा रहे हैं। विभिन्न कानूनों के माध्यम से उन पर दमन जारी है। 

भाजपा नेतृत्व वाली केन्द्र सरकार की नीतियाँ मजदूर विरोधी हैं। जिस प्रकार सरकार नीजी क्षेत्र को प्राकृतिक संसाधनों को लूट की अनुमति, भूमि अधिग्रहण तथा पुंजीपतियों को कर में छूट तथा सार्वजनिक क्षेत्र में निवेष में कटौती कर रही है उससे बेरोजगारी में वृद्धि होगी। बढ़ती आर्थिक विषमता से समाजिक असंतोष में वृद्धि होगी।

लगातार जन संघर्षों के बाद मजदूरों के हित में जो आधे-अधूरे नीतियाँ बनी उन्हें भी वर्तमान सरकार बदलना चाहती है। राजस्थान की भाजपा सरकार ने सर्वप्रथम मजदूरों के हित वाले कानून में नकारात्मक बदलाव किया है। इंडस्ट्रीयल डिस्प्यूट एक्ट के अंतर्गत 300 मजदूर क्षमता वाली कंपनियां बिना सरकार की अनुमति के कंपनी बंद कर मजदूरों का हटा सकती है। इसी आधार पर केन्द्र सरकार स्माल फैक्ट्री (रेगूलेषन आफ इम्प्लायमेन्ट एण्ड कंडीषन आफ सर्वीस) बिल 2014 ला रही है। इसके तहत द फैक्ट्री एक्ट, 1947, द इंडस्ट्रीयल इम्प्लायमेंट (स्टैडिंग आर्डर) एक्ट 1946, न्यूनतम मजदूरी कानून 1948, मजदूरी भुगतान कानून 1936, बोनस भुगतान कानून 1965, द इम्प्लार्इ स्टेट इंसुरेंस एक्ट 1948, द इम्प्लार्इ प्रोविडेंट फंड एण्ड मिसलेनियस प्रोविसन एक्ट 1952, मातृत्व लाभ कानून 1961, द इम्प्लार्इ कम्पेनसेषन एक्ट 1923, द इंटर स्टेट मार्इग्रेंट वर्कमेन (रेगुलेषन आफ इम्प्लायमेन्ट एण्ड कंडीषन आफ सर्वीस) एक्ट 1979, (राज्य) शाप एण्ड इस्टैबलीषमेन्ट एक्ट, द इक्वल रेमुनरेषन एक्ट 1976, द चार्इल्ड लेबर (प्रोहिबिषन एण्ड रेगुलेषन) एक्ट 1986 आयेंगे। ये सारे कानून उन फैक्ट्रीयों में नहीं लागू होंगे जहां 40 से कम मजदूर काम करते हैं।  अत: आज के जमाने में जहां टेक्नोलाजी का सहारा अधिक लिया जाता है वहां इन कानूनों के नहीं लागू होने से मजदूरों का अहित होगा।

बुष-मनमोहन परमााणु करार का भाजपा ने विरोध किया था परन्तु वर्तमान मोदी सरकार ने पहले से ही कमजोर परमाणु दायित्व विधेयक के सेक्षन 17 और सेक्षन 46 को नजरअंदाज करते हुये परमाणु करार पर मुहर लगा दी। इस कारार के अनुसार कोर्इ हादसा होने पर परमाणु रिएक्टर आपूर्तिकर्ता कंपनियां जिम्मेदार नहीं होंगी।

मनरेगा जैसे रोजगारपरक योजनाओं में पिछले वर्ष 2014-15 में 34000 करोड़ रुपये को भी पुरा खर्च नहीं किया जा सका। वर्तमान वितितय वर्ष 2015-16 में भी इतनी राषी ही तय की गर्इ है। इसमें पिछला बकाया शामिल नहीं है। पिछले वर्ष जिन मजदूरों का मजदूरी बकाया था तथा जो योजना अधूरा इन्हें पूरा नहीं किया जा सकेगा। यदि बढ़ती महंगार्इ, बकाया और कार्य मांग के आधार पर हिसाब लगाया जाए तो मनरेगा के लिए कम-से-कम 45000 करोड़ रुपये होना चाहिए। 

केन्द्र द्वारा ग्रामीण विकास विभाग, शहरी विकास विभाग, कृषि आदि की बजट में 20 प्रतिषत तक की कटौती किया जा रहा है। इससे मनरेगा तथा अन्य कल्याणकारी योजनाओं का क्रियान्वयन प्रभावित हो रहा है। श्रम आधारित कार्यक्रम मनरेगा में कटौती से ग्रामीण क्षेत्र के गरीब मजदूरों का अहित और ठेकेदारों को फायदा होगा। मनरेगा में श्रम-सामाग्री अनुपात को 60:40 की जगह 51:49 करने की बात की जा रही है। इस कार्यक्रम के तहत पंचायतों के विकास की योजनाओं के लिये देष भर में लगभग 30000 करोड़ रुपये बैठती है। वर्ष 2015-16 के बजट में मनरेगा के बजट में भारी कटौती की संभावना है साथ ही मनरेगा की की कवरेज भी कम करने की योजना बनायी जा रही है। ऐसा करने से महिलाओं, अनुसूचित जाति, जनजाति को नुकसान तो होगा ही खेती की उत्पादकता में भी कमी आएगी। 

ज़रा मनरेगा की उपलबिधयों पर गौर फरमाते हैं। वर्ष 2008-09 से 2013 तक ग्रामीण विकास मंत्रालय के अनुसार लगभग साढ़चार करोड़ से लेकर साढ़े पांच करोड़ तक गरीब ग्रामीण परिवारों को रोजगार मिला। यानी देष की कुल ग्रामीण परिवारों का लगभग 30 प्रतिषत। रोजगार पाने वालों में लगभग आधी संख्या महिलाओं की थी और कुल संख्या का पांचवा हिस्सा अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों का था। 

इसके अलावे मनरेगा के और भी अन्य फायदे हुये हैं। जैसे- लगभग 2.5 अरब मानव-दिवस का मौसमी रोजगार प्रति वर्ष सृजित कर ग्रामीण इलाकों में छिपी हुर्इ बेरोजगारी या अंष-रोजगार (6.66 अरब मानव-दिवस) की समस्या लगभग 41 प्रतिषत हल हुर्इ। जहां-जहां सही अमल हुआ, वहां मनरेगा की वजह से ग्रामीण इलाकों से मजबूरन पलायन कम हुआ। मनरेगा की आमदनी से ग्रामीणों का क्रय शकित बढ़ने से गांवों में उपभोक्ता वस्तुओं की मांग में वृद्धि हुर्इ। ग्रामीण महिलाओं के हाथों में पैसा आने से उनके कुपोषण की समस्या पर थोड़ा असर पड़ा।

षिक्षा व स्वास्थ्य जैसे सार्वजनिक मदों के खर्चे में कटौती कर नीजीकरण को बढ़ावा दे रही है। विŸािय वर्ष 2014-15 की तुलना में विŸािय वर्ष 2015-16 के बजट में सर्वषिक्षा अभियान में 28258 करोड़ से घटाकर 22000 करोड़ (लगभग 22 प्रतिषत), मध्याहन भोजन योजना में 13215 करोड़ से घटाकर 8900 करोड़ (लगभग 33 प्रतिषत), राष्ट्रीय माध्यमिक षिक्षा अभियान में 5000 करोड़ से घटाकर 3565 करोड़ (लगभग 29 प्रतिषत), समेकित बाल विकास सेवाओं में 18691 करोड़ से घटाकर 8754 करोड़ (लगभग 53 प्रतिषत), राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिषन में 21912 करोड़ से घटाकर 18000 (लगभग 17 प्रतिषत), राष्ट्रीय कृषि विकास योजना में 9954 करोड़ से घटाकर 4500 करोड़ (लगभग 55 प्रतिषत) रुपये की भारी कटौती की गर्इ है। (स्रोत: यूनियन बजट)

केन्द्र सरकार द्वारा गठित शांता कुमार समिति ने अपनी रिपोर्ट में अनुसंषा की है कि किसानों से अनाज का सीमित उठाव करना चाहिये। इससे किसानों को नुकसान होगा। कमीटी की रिपोर्ट के अनुसार एपीएल-बीपीएल को फिर से आधार बनाकर राषन वितरण किया जाना चाहिये। इसमें अन्त्योदया के लाभार्थी को छोड़कर शेष लाभार्थियों को खाधान्न मूल्य में वृद्धि करते हुये न्यूनतम समर्थन मूल्य के आधे मूल्य पर राषन देने की सिफारिष की गर्इ है। इसके अलावा कमीटी ने खाध सुरक्षा कानून के तहत लाभार्थियों की संख्या को 67 प्रतिषत से घटाकर 45 प्रतिषत करने की बात की है। यदि ऐसा होता है तो बड़ी संख्या में मजदूर और छोटे किसान खाध सुरक्षा के लाभ से वंचित हो जायेंगे। 

वर्तमान समय में मजदूरों को सम्मानजनक मजदूरी नहीं मिल पाता है। महंगार्इ और कर्ज की मार से गरीब, किसान आत्महत्या को मजबूर हैं। ऐसी सिथति में केन्द्र सरकार इनके मूंह से निवाला छिनने का प्रयास कर रही है। 

सरकार राजस्व प्रापित के स्रोतों व राजस्व दरों में वृद्धि के बजाए गरीबों के योजनाओं में कटौती कर रही है। सरकार कारपोरेट क्षेत्र तथा पूंजीपती घरानों को टैक्स में भारी छूट दे रही है। वर्ष 2013-14 में टैक्स छूट 5,49,984.1 करोड़ थी जो बढ़कर वर्ष 2014-15 में 5,89,285.2 करोड़ हो गर्इ। एक अनुमान के अनुसार यह कर माफी कुल कर राजस्व का 43.2 प्रतिषत है। 

हमारे देष में प्रत्यक्ष कर में अप्रत्यक्ष कर के मुकाबले लगातार कमी आ रही है। 100 रुपये में 30 रुपये प्रत्यक्ष कर से जबकि 70 रुपये अप्रत्यक्ष कर से प्राप्त होता है। प्रत्यक्ष कर सकल घरेलु उत्पाद के अनुपात में वर्ष 2009-10 से ठहर गर्इ है जबकि अप्रत्यक्ष कर लगातार बढ़ रहा है। अप्रत्यक्ष कर के माध्यम से आम जनता से राजस्व इकटठा किया जाता है। इसके बावजूद उनके हित वाले योजना की राषि में कटौती की जा रही है। इसी कारण मंदी के बावजूद उपभोक्ता सामानों के दामों में अप्रत्याषित वृद्धि हुर्इ है।

केन्द्र सरकार ने भूमि अधिग्रहण कानून 2013 का संषोधन के लिये भूमि अधिग्रहण अध्यादेष 2014 लाया गया है। इसके दबाव में तत्कालीन सरकार ने अंग्रेजों द्वारा बनाए गये दमनकारी 1894 के लगभग सवा सौ साल पश्चात लंबे संघर्षों के बाद 2013 में भूमि अधिग्रहण कानून बनाया (इसके समर्थम में भाजपा सांसदों ने भी वोट किया था) जिसमें किसानों की सहमति, सामाजिक असर मूल्यांकन, पुनर्वास-मुआवजे का सिद्धांत स्थापित किया था। वर्तमान सरकार ने इसे तोड़मरोड़ कर बरबाद कर दिया। 


भोजन का अधिकार अभियान (बिहार)
लोक परिषद, बिहार दलित अधिकार मंच (बिहार), एकता परिषद, जन स्वास्थ्य अभियान, बिहार प्रोग्रेसिव एलाएंस, बिहार विमेन्स नेटवर्क, बिहार महिला समाज, झुग्गी-झोपड़ी संघर्ष मोर्चा, लोक समिति, साझी आवाज, सी.ए.सी.एल., जन जागरण शकित संगठन, जल जमाव विरोधी संघर्ष समिति, एन.ए.पी.एम., मुसहर विकास मंच, बिहार वालंटरी फोरम फार एजुकेषन।

सुधार या खाद्य सुरक्षा में कटौती?

नितिन सेठी,बिजनेस स्टैण्डर्ड

राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार ने भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) के कामकाज में सुधार और पुनर्गठन के लिए एक उच्च स्तरीय शांता कुमार समिति का गठन किया था। इसके बजाय समिति अंत में पूरे कृषि क्षेत्र और सरकार की खाद्य सुरक्षा नीति के पुनर्गठन का एक खाका प्रस्तुत कर गई। ऐसा करके समिति संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार के दूसरे कार्यकाल के दौरान चली बहस को फिर से छेड़ दिया कि क्या राष्ट्रीय सुरक्षा कानून को जितना संभव हो सके कमतर (सीमित) किया जाना चाहिए या क्या यह मौजूदा सार्वजनिक वितरण प्रणाली का एक महंगा सुधार है?

शांता कुमार समिति ने एफसीआई के काम और उसके काम के तरीके में बदलाव के लिए कई सिफारिशें की थीं। लेकिन यह खाद्य सुरक्षा पर एक बड़ी सिफारिश है। समिति सुझाव देती है कि मध्यम अवधि में देश को एफसीआई के माध्यम से सब्सिडीयुक्त अनाज के वितरण के बजाय नकदी हस्तांतरण की दिशा में कदम बढ़ाने चाहिए। इसका यह भी मतलब होगा कि सरकार की न्यूनतम समर्थन मूल्य पर किसानों से अनाज खरीदने की भूमिका में खासी कमी आएगी।

लघु अवधि में समिति ने राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून को सीमित करने का सुझाव दिया है। देश की कम से कम 67 फीसदी आबादी को सब्सिडी युक्त अनाज उपलब्ध कराने के बजाय कानून के तहत अधिकतम 40 फीसदी आबादी को कम सब्सिडी पर प्रति व्यक्ति 7 किलोग्राम अनाज (5 किलोग्राम के बजाय) दिया जाना चाहिए। समिति ने 3 रुपये प्रति किलोग्राम पर चावल और 2 रुपये प्रति किलोग्राम पर गेहूं के बजाय सिफारिश की है कि इस कीमत को किसानों को दिए जाने वाले न्यूनतम समर्थन मूल्य का आधार रखा जाना चाहिए। इससे गरीबों को मिलने वाले अनाज की कीमत तीन से चार गुना बढ़ जाएगी।

वरिष्ठ भाजपा नेता शांता कुमार की अगुआई वाली समिति 2014 के चुनावी घोषणा पत्र में किए गए वादे और इसके साथ संसद में अपने रुख से काफी दूर चली गई है, जब राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा विधेयक पर चर्चा हुई थी। वित्त मंत्री अरुण जेटली सहित संसद में मौजूद कई भाजपा सदस्यों ने इस विधेयक की निंदा करते हुए कहा था कि यह कुछ लोगों के ऊपर फेंका जा रहा सामाजिक सुरक्षा का जाल है। कुछ ने इस योजना के सर्वमान्य होने पर सवाल खड़े किए थे। यहां तक कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जो उस समय गुजरात के मुख्यमंत्री थे, ने भी राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून को निशाने पर लेते हुए उसे संप्रग सरकार द्वारा किए जा रहे प्रचार की तुलना में कम फायदेमंद बताया था। 

विधेयक के पारित होने से पहले उन्होंने कहा था, 'लाभार्थियों के चयन का तरीका यह है कि आप एक मापदंड तय करते हैं, एक सर्वेक्षण करते हैं और फिर पहचान करते हैं कि कौन इस योजना का हकदार है। आपका खाद्य सुरक्षा विधेयक कुछ ऐसा है कि आपने लाभार्थियों की संख्या के संबंध में पहले ही फैसला कर लिया है। और अब आप इस सीमा पर अमल करने के लिए राज्यों पर दबाव बना रहे हैं और ऐसे परिवारों को तलाशने के लिए कह रहे हैं। यह प्रक्रिया इस योजना को कभी सफल नहीं बना सकेगी।'

शांता कुमार समिति द्वारा की गई सिफारिशें गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के रुख से पूरी तरह उलट है। इसमें भी केंद्र द्वारा एक कृत्रिम सीमा की सलाह दी गई है और लाभार्थियों की संख्या को देश की कुल आबादी को 40 फीसदी से नीचे रखने का सुझाव दिया गया है। अगर समिति की सिफारिशों को स्वीकार कर लिया जाता है तो इसका मतलब है कि राजग सरकार ग्रामीण भारत में प्रति व्यक्ति रोजाना 29.2 रुपये से कम खर्च करने वाले को गरीबी रेखा से नीचे मान लेगी। दूसरे शब्दों में नैशनल सैंपल सर्वे डाटा पर आधारित उनकी गणनाओं से पता चलता है कि ग्रामीण भारत में 29.2 रुपये प्रति दिन और शहरी भारत में 46.75 रुपये प्रति दिन से ज्यादा खर्च करने वाला खाद्य सुरक्षा कानून के अंतर्गत लाभ पाने का हकदार नहीं होगा।

शांता कुमार ने अपने रुख को सही ठहराया है। मीडिया रिपोर्ट में कुमार ने कहा, 'जब अधिनियम संसद में आया था, तो कई लोगों ने 67 फीसदी के स्तर को ज्यादा माना था। लेकिन आप चुनावों के मद्देनजर राजनीतिक हालात को जानते हैं। अगर उस समय चुनाव नजदीक नहीं होते तो कोई भी राजनीतिक दल इस विधेयक को पारित नहीं होने देता। हालांकि हम जानते थे कि आगे हमारी सरकार आ रही है और हम इसमें सुधार करेंगे।'

शांता कुमार की बातों से साफ होता है कि चुनाव के आसपास भाजपा की मुद्रा और रुख अलग था, अब केंद्र में सत्ता में आने के बाद उसका रुख अलग है। लेकिन केंद्र सरकार ने इस तरह की खबरों पर अभी तक कोई टिप्पणी नहीं की है। गरीब लाभार्थियों की पहचान के लिए सर्वेक्षण नए तरीके से किया जाना था। इसके बिना लाभार्थियों की मौजूदा सूची एक दशक से ज्यादा वक्त पुरानी है। वाम दल और कांग्रेस शांता कुमार समिति की रिपोर्ट को एफसीआई में महज सुधार के बजाय खाद्य सुरक्षा कानून पर हमले के रूप में देख सकते हैं। रिपोर्ट में शांता कुमार समिति के सदस्य अशोक गुलाटी की छाप की अनदेखी करना काफी मुश्किल है। 

संप्रग सरकार में कृषि लागत एवं मूल्य आयोग जो किसानों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य पर सिफारिश करता है, के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने कई आधिकारिक चर्चा पत्रों के माध्यम से यही रुख जाहिर हुआ था। हालांकि राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून के साथ ही कांग्रेस चुनाव हार गई। शांता कुमार की रिपोर्ट और गुलाटी का नजरिया भले ही अब सरकार के भीतर चर्चा में हो, लेकिन इसका भविष्य इस पर तय होगा कि गुजरात के मुख्यमंत्री की तुलना में प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी का रुख क्या रहता है।

RIGHT TO FOOD CAMPAIGN CONDEMNS THE REDUCTION IN COVERAGE UNDER NFSA FROM 67% to 40%

Right to Food Campaign
(Secretariat)
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G-46, First Floor, Green Park (Main), New Delhi 110016
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Ph: 011- 29849563, Email: righttofood@gmail.com, Website: www.righttofoodcampaign.in


23rd January 2015
REJECT SHANTA KUMAR COMMITTEE’S RECOMMENDATIONS:
RESIST REDUCTION IN COVERAGE FROM 67% to 40% OF INDIA’s POPULATION AND INCREASE IN PRICES
PROTECT PEOPLE’S ENTITLEMENTS TO FOOD: STRENGTHEN THE NFSA

The National Food Security Act (NFSA) seems to be the next target of this Government which has initiated a process of amending and diluting laws that exist for the protection of the rights of the poor and excluded in our country. First, it was the labour laws and mining laws and then the Land Acquisition Act. Now it is the turn of the NFSA and NREGA.
If the Government accepts the Shanta Kumar Committee’s recommendations for decreasing the coverage under NFSA (from 67% to 40%) and shifting from PDS to cash transfers over the next few years, they will be going back on the promises made by them in Parliament and in the BJP election manifesto. The Committee also recommends increasing of prices from the current Rs. 3 for rice and Rs. 2 for wheat to a price of which is 50% of the MSP. This would be a 3-4 fold increase in the price at which subsidised foodgrains are available from the PDS.
In fact, we would like to remind Shri. Narendra Modi that as the Chief Minister of Gujarat in his September 2013 letter to then Prime Minister Dr. Manmohan Singh on the NFSA he had specifically lamented against potential increases in prices, “I am further saddened to note that as per the proposed pricing structure for the grain, the BPL family will now have to incur Rs 85 more net expenditure per month for availing 35 kg [of grain].” [see Attached Letter in Original]

During the debate on the NFSA on the floor of the Parliament in 2013, many BJP leaders had criticised the then government for bringing in a minimalist legislation. The BJP leaders had then introduced amendments towards universalising PDS benefits to ensure that “every person” shall be entitled to food grains, increasing the quantity of grains and include pulses and oils. Now that they are in a majority in Parliament, it is time for them to ensure that these provisions are included in the Act and not to dilute even the little that has been gained through the NFSA.
Further Finance Minister Arun Jailey, on the floor of the Rajya Sabha during the passage of the law had berated the previous government “you have infact cut down the number of people.”

BJP needs to live up to its manifesto promise of ensuring universal food security. The BJP manifesto states, “BJP has always held that ‘universal food security’ is integral to national security. BJP will take steps to ensure that the benefits of the scheme reach the common man and that the right to food does not remain an act on paper or a political rhetoric…”
Making these changes would only cause a lot of confusion on the ground and result in the greater leakages. The states have only now started to seriously identify and issue new ration cards based on the NFSA. Many states are yet to begin the process. Even with the expanded coverage it is being seen in state after state that is it very difficult to come with an identification criteria and process that will have minimal inclusion and exclusion errors.
Given the extent of hunger and malnutrition and low levels of living, a targeted programme with low coverage (the committee proposes 40%) is bound to fail. In fact, what is required is a move towards a universal PDS. India continues to rank very low in the Global Hunger Index (55th) and Human Development Index (135th). According to the latest NSS estimates (2011-12) 40% of people in rural areas have a consumption expenditure of less than about Rs. 30 a day.
Introducing cash transfers in the place of PDS will have serious negative implications on food security. Further, cash transfers do not automatically solve either the problem of targeting or of leakages. Infact BJP member of parliament Sushma Swaraj had specifically moved an amendment on the floor of the Lok Sabha to “remove the provision of cash transfer and food coupons in lieu of foodgrains entitlements.”  [See Attached Note on Replacing PDS with Cash Transfers].
It does not make any sense to talk about diluting the PDS at a time when states are initiating reforms to strengthen the PDS including door-step delivery of food grains, de-privatisation of ration shops, decentralized procurement, social audits and increased transparency. Indeed, states where such reforms have now been in place for some time such as Tamil Nadu, Andhra Pradesh, Kerala, Odisha and Chhattisgarh are showing lower leakages than others. What is required at this time is a strong message from the central government that there cannot be any further delays in the implementation of the NFSA.
Along with the PDS, the NFSA also has promised universal maternity benefits which we hope to see being rolled out in the upcoming budget. It has been over a year since the NFSA has been passed. By repeatedly delaying the deadline for its implementation, the Government has in fact been violating the Act. There is no meaning to the Parliament passing laws if they can so easily be violated by Governments.
We appeal to the Prime Minister, not to go back on the NFSA and remind Shri. Narendra Modi of his letter to then Prime Minister Dr. Manmohan Singh on the NFSA where he lamented the fact that the Food Security Ordinance is too minimalistic and “does not assure an individual of having two meals a day”. Rather than watering down the very little that has been included in the legislation, with the Delhi elections round the corner,  it is time that the new government not indulge in doublespeak.*.
For more information please contact Kavita Srivastava (9351562965), Dipa Sinha (9650434777) or Alokika Singh (9717852311)

We are,

Members of the Steering Group, Right to Food Campaign

Kavita Srivastava and Dipa Sinha, Convenors, Steering Committee of Right to Food Campaign

National Networks
Jean Drez, VB Rawat (Former Support Group)
Annie Raja, (National Federation for Indian Women)
Colin Gonsalves , (Human Right Law Network)
Aruna Roy, Nikhil Dey and Anjali Bhardwaj, (National Campaign for People's Right to Information)
Madhuresh, Arundhati Dhuru and Ulka Mahajan (National Alliance of People’s Movements)
Asha Mishra and Kashinath Chatterjee (Bharat Gyan Vigyan Samiti)
Ashok Bharti (National Conference of Dalit Organizations)
Anuradha Talwar, Gautam Modi and Madhuri Krishnaswamy (New Trade Union Initiative)
Binayak Sen (People’s Union for Civil Liberties)
Subhash Bhatnagar (National Campaign Committee for Unorganized Sector workers)
Paul Divakar and Asha Kowtal (National Campaign for Dalit Human Rights)
Mira Shiva, Radha Holla and Vandana Prasad (Jan Swasthya Abhiyan)
Ranjeet Kumar Verma, Prahlad Ray, Praveen Kumar, Anand Malakar (Rashtriya Viklang Manch)
Lali Dhakar, Sarawasti Singh, Shilpa Dey and Radha Raghwal (National Forum for Single Women’s Rights)
G V Ramanjaneyulu, Kavita Kuruganthi (Alliance for Sustainable and Holistic Agriculture)
Jashodhara (National Alliance for Maternal Health and Human Rights)
Ilango (National Fishworkers Federation)
Zasia, Sonam, and Noor Jehan (Bhartiya Muslim Mahila Andolan)
Mayank Sinha, National Network on Nomadic and Denotified Nomadic Tribes

State Representatives
M Kodandram, Rama Melkape, Veena Shatrughana (Andhra Pradesh)
Gangabhai and Samir Garg (Chhattisgarh)
Abhay Kumar (Karnataka)
Suresh Sawant, Mukta Srivastava (Maharashtra)
Balram and James Herenj, Gurjeet Singh, Dheeraj (Jharkhand)
Ashok Khandelwal, Shyam and Vijay Lakshmi (Rajasthan)
Sachin Jain (Madhya Pradesh)
Sejal Dand, Neeta Hardikar and (Gujarat)
Saito Basumaatary, Raju Narzari, Bondita Acharya and Sunil Kaul (Assam)
Rupesh,  (Bihar)
V Suresh (Tamil Nadu)
Bidyut Mohanty  Raj Kishore Mishra, (Orissa)
Bindu Singh, Sabina and Richa (Uttar Pradesh)
Pushpa, Dharmendra, Ramendra, Yogesh, Vimla and Sarita (Delhi)
Fr Jothi SJ  and Mr. Saradindu (West Bengal)
Biraj Patnaik, Harsh Mander, Reetika Khera, Manas Ranjan, Vidya Bhushan Rawat, Jean Dreze, Ankita Aggarwal, Swati Narayan and Ritu Priya


Attachments:
  1. 1. In July 2014, immediately after the general elections, the Right to Food Campaign had released the video Modi’s Doublespeak: Universal Food Security available at https://www.youtube.com/watch?v=qoI1NXpM3pk
  2. 3. Note on Replacing PDS with Cash Transfers [Find Attached]
  3. 4. State-wise calculations on Proposed Reduction in Coverage based on Shantha Committee Recommendations [Find Attached]

झारखंड के स्कूलों में चला आज “अंडा अभियान”

भोजन का अधिकार, झारखंड के अंडा अभियान में आज झारखंड के 19 ज़िलों में बच्चों को स्कूल में अंडा खिलाया गया. यह अभियान झारखंड में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून के तुरंत क्रियान्वन की मांग को लेकर आयोजित किया गया था. यह कानून बच्चों को रोज़ स्कूल या आंगनवाड़ी के माध्यम से पौष्टिक भोजन व हर गर्भवती महिला को 6,000 रुपए के मातृत्व लाभ का अधिकार देता है. साथ ही साथ, इस कानून के अनुसार झारखंड के ग्रामीण क्षेत्रों के 86 प्रतिशत परिवारों व शहरी क्षेत्रों के 58 प्रतिशत परिवारों को जन वितरण प्रणाली से सस्ता राशन मिलेगा.

Children Served Eggs across Jharkhand in “Anda Abhiyan”

Thousands of children across 19 districts of Jharkhand were served eggs today in their midday meal as part of the Right to Food Campaign’s anda abhiyan, which demanded the immediate implementation of the National Food Security Act. The Act provides not only for a daily nutritious meal for every child (at the local school or anganwadi), but also for maternity entitlements of Rs 6,000 for every pregnant woman. Further, 86 per cent of households in rural Jharkhand and 58 per cent of households in urban Jharkhand are to be given subsidized foodgrains under the Public Distribution System.

मातृत्व हक के बिना कैसे अच्छे दिन!

सचिन कुमार जैन

वर्ष 2001 से 2011 के बीच हुई जनसंख्या वृद्धि के हिसाब से हर साल भारत में लगभग 1.9 करोड़ प्रसव होते हैं, मौजूदा मातृ मृत्यु अनुपात 178 है, जिसके हिसाब से हर साल लगभग 34 हज़ार महिलाएं प्रसव से संबंधित कारणों से अपना जीवन खो देती हैं। 

इतना ही नहीं विश्व बैंक के मुताबिक हर 190 में एक महिला की मृत्यु का कारण मातृत्व से संबंधित जोखिम होता है। इसका मतलब यह है कि हमारे यहां महिलाओं को उनके मौलिक मातृत्व हक नहीं मिल रहे हैं। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा क़ानून में 30 शब्दों में एक प्रावधान है, जो देश में 39 करोड़ महिलाओं, खासतौर पर असंगठित क्षेत्र में काम करने वाली और अपने घरों को चलाने का बिना पारिश्रमिक वाला श्रम करने वाली महिलाओं को ऐसा हक देता है, जिसके बारे में सरकारें और समाज का रवैया उपेक्षा और भेदभाव से भरपूर रहा है। 

AHMEDABAD DECLARATION: 5th NATIONAL CONVENTION ON RIGHT TO FOOD AND WORK 1st to 3rd MARCH, 2014 AHMEDABAD (GUJARAT)


NFSA and Beyond
Right to Food, Democracy and Social Justice

We the members of the Right to Food campaign, who are gathered here from 15 states across the country for the fifth national convention, express our solidarity with all peoples’ movements and struggles for basic rights, Democracy and Social Justice. We deeply mourn the death of all our comrades who have lost their lives in the various battles for people’s causes including the right to information, against land alienation and anti-poor policies of the state. We are deeply aggrieved by the needless deaths of men, women, transgender people and children because of persisting hunger, malnutrition and lack of health care, of women because of lack of maternal nutrition and care. We also express our sorrow for the death of the thousands of toiling farmers, labouring people who have committed suicide, each year losing their struggle for survival and lives lost as a result of communal and caste violence.

We condemn the fact that 67 years after Independence, a large section of our people are denied their basic rights to food, nutrition, health, education, livelihood and social security, justice and peace.
We condemn the continued discrimination against dalits, minorities, tribals, women, transgender community and disabled. We are deeply concerned with the shrinking democratic spaces for people’s movements and pro-poor policy making.  Even as non-violent, peaceful agitations are being crushed brutally by an increasingly repressive state, we resolve to continue our struggles for the right to food, democracy and social justice. We stand in solidarity with all movements against patriarchy and violence against women and pro-people democratic political forces. We condemn the interference in our sovereign food systems by the WTO mechanisms, FTAs and other international trade agreements and the decision to allow field trials of GM crops in India.

अहमदाबाद संकल्प:भोजन और काम के अधिकार पर पांचवा राष्ट्रीय अधिवेशन गुजरात में 1 से 3 मार्च, 2014


राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा क़ानून और उससे आगे
भोजन का अधिकार, लोकतंत्र और सामाजिक न्याय

देश के 15 राज्यों से विभिन्न सामाजिक संगठनों, जनसंगठनों, संस्थाओं और समुदाय के 2000 से ज्यादा लोग जो रोज़ी रोटी अधिकार अभियान के सदस्य के रूप में लोक अधिकारों, लोकतंत्र और सामाजिक न्याय पर केंद्रित पांचवे अधिवेशन में सम्मिलित हुए, सामाजिक समानता, शोषण से मुक्ति, बुनियादी अधिकारों को सुनिश्चित करने और बेहतर समाज की स्थापना के लिए चल रहे सभी अहिंसात्मक जमीनी जनसंघर्षों और आन्दोलनों के प्रति अपनी एकजुटता प्रकट करते हैं।
हम सब, समाज के मसलों और समस्याओं, जैसे सूचना के अधिकार, जवाबदेयता की मांग, भ्रष्टाचार, भूमि अधिग्रहण, श्रमिकों का शोषण करने और वंचित तबकों के अधिकारों का उल्लंघन करने वाली नीतियों की खिलाफत करते हुए अपने जीवन की आहूति देने वाले सभी संघर्षशील साथियों की शहादत को नमन करते हैं।
हम बहुत व्यथित होकर स्वास्थ्य सेवाओं के अभाव, कुपोषण, सतत भुखमरी के शिकार होकर मर जाने वाले बच्चों, महिलाओं, पुरुषों और तीसरे लिंग वाले समुदायों के प्रति संवेदना और दुःख व्यक्त करते हैं। हम मानते हैं कि मातृत्व सेवाओं का अभाव महिलाओं का जीवन खत्म कर देता है। इन सबको को बचाया जा सकता है। 
हम उन सभी मेहनतकश हजारों किसानों के प्रति भी श्रृद्धांजलि अर्पित करते हैं, जिन्होंने शोषणकारी नीतियों के खिलाफ अपनी आजीविका को बचने का संघर्ष करते हुए आत्महत्या करना पड़ी, साथ की उन लोगों को भी श्रद्धांजलि, जिन्होंने साम्प्रदायिक और जातिगत हिंसा में अपना जीवन खो दिया।
हम इस बात की निंदा करते हैं कि देश की आजादी के 67 साल बाद भी आबादी को भोजन, पोषण, स्वास्थ्य, शिक्षा, आजीविका, सामाजिक सुरक्षा, शांति और सामाजिक न्याय जैसे बुनियादी हक भी उपलब्ध नहीं हैं।

क्या बाली में एक हार की शुरुआत हुई है?

सचिन जैन 

मैं यहाँ हार-जीत का शब्द इस्तेमाल नहीं करता; पर जिस तरह डब्ल्यूटीओ की बाली बैठक में अमेरिका-यूरोपीय यूनियन के नेतृत्व में साम-दाम-दंड-भेद का खेल दुनिया की सरकारों ने खेला; उसमे तो हार-जीत का पुट है. प्रथम दृष्टया यह नज़र आता है कि वहां भारत सरकार जीत गयी, पर भारत के किसान और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा क़ानून के हकदार हार गए. सवाल यह भी खड़ा हो गया है कि कुछ देशों का समूह (जी-33) एक साथ अपनी मांगें लेकर बाली गए थे, पर ऐसा लगता है कि आखिर में भारत और अमेरिका आमने-सामने बैठ कर समझौता करने लगे. एक मायने में क्या हम अपनी ईमानदार कूटनीतिक छवि के साथ भी समझौता नहीं कर आये? 3 से 6  दिसम्बर 2013 के दौरान जो हुआ, उसे इस देश के हर व्यक्ति को अभी ही जान लेना आवश्यक है; क्योंकि अगले अबसे पांचवे साल में इसका असर दिखने लगेगा जब सरकार खाद्य सुरक्षा पर अपने खर्चे को कम करने के लिए बाध्य होगी.

डब्ल्यूटीओ में भारत को झुकना क्यों नहीं चाहिए था..

सचिन जैन 

इंडोनेशिया के बाली द्वीप पर 3 से 6  दिसम्बर 2013 तक विश्व व्यापार संगठन की बैठक हुई. दुनिया में भोजन के व्यापार और भोजन के अधिकार के सन्दर्भ में इस बैठक के कुछ कूटनीतिक महत्त्व भी थे. डब्ल्यूटीओ को अस्तित्व में आये अब बीस वर्ष होने जा रहे हैं, पर अब तक सभी 160 सदस्य देशों के बीच वैश्विक व्यपार के लिए एक भी सर्वसम्मत समझौता नहीं हो पाया है. कारण – अमेरिका और यूरोपीय यूनियन ऐसे अनुबंध करवाना चाहते हैं, जिनसे पूरी दुनिया में उनके उत्पाद और उत्पादकों का नियंत्रण हो जाए. उनके लिए डब्ल्यूटीओ दूसरे देशों को अपना आर्थिक उपनिवेश बनाने का जरिया है.

Amma Restaurants of Tamil Nadu Panacea for Urban Food Insecurity?

S Rajendran(Economic and Political Weekly)


The Tamil Nadu state government has started 283 subsidised restaurants - amma unavagams - in nine urban centres. This initiative has been a hit with a wide spectrum of urban consumers. However, the majority of the patrons seem to be the working urban poor. These initiatives have been accused of being "populist" but this model of providing affordable cooked food in urban areas promises to not only ensure food security but also keep food prices in check.

खाद्य सुरक्षा के व्यापार में हमने क्या बेंचा?

सचिन जैन 



डब्ल्यूटीओ की बाली बैठक में ६ दिसम्बर २०१३ को जिस समझौते के किये भारत सरकार राज़ी हो गयी, वह समझौता साफ़ संकेत देता है कि प्रभावशाली कूटनीतिक पूँजी की ताकत से सामने हम झुक गए. अब न तो भारत आसानी से न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ा सकेगा, न ही खाद्य सुरक्षा कार्यक्रमों का ज्यादा विस्तार कर सकेगा. इतना ही नहीं बाली समझौते के मुताबिक अब उसे सभी जानकारियाँ विकसित देशों को देना होंगी. वास्तविकता यह है कि हमारी सरकार अब भी यह तय नहीं कर पा रही है कि विकसित देशों के लाभ के लिए हम अपनी ताकत यानी खेती को दाँव पर क्यों लगा रहे हैं?  खेती और खाद्य रियायत पर समझौता करने का मतलब था ६५ करोड किसानों और खाद्य सुरक्षा क़ानून के ८७ करोड लोगों के हकों को सीमित करने की शुरुआत; क्योंकि इस क़ानून के लागू होते ही खेती को दी जाने वाली सब्सिडी कृषि उत्पादन के १० फीसदी हिस्से से ऊपर निकल जाना निश्चित है. इस मामले पर बाली की बैठक शुरू होने के पहले ही जब भारत सरकार को डब्ल्यूटीओ से इन प्रस्तावित समझौता प्रावधानों का प्रारूप मिला, तभी से यह बहस शुरू हो गयी थी कि हमारी सरकार क्या इस बिंदु (जिसे पीस क्लाज़ कहा जा रहा था) के लिए सहमत होगी? 

Government Cracks Whip on Delays in NREGA Payments, Rs 5.17Lakhs Paid as Pending Wages and Compensation to Khunti Workers

Khunti (26 November 2013): In August this year, the Jharkhand Labour Commission passed a landmark order awarding compensation of Rs 2,000 per worker for delay and non-payment of wages in a work done under the National Rural Employment Guarantee Scheme of Murhigram panchayat in Khunti block. A total of 91 workers were paid pending wages and compensation money, amounting to a total of Rs5.17 lakhs.Of the 91 workers, 79 workers came to the Khunti block office today to receive the money. Four workers had died since working and the rest eight have either migrated in search of work or could not come because of ill health. Their money was collected by their family members. The compensation amount was recovered from the Block Development Officer, Block Programme Officer, RozgarSevak and Panchayat Sevak.

India Blinks Under US Pressure at WTO Ministerial in Bali.

India has wilted under pressure from the US and agreed to accept conditionalities that were not part of the G-33 proposal. The text of the agreed draft can be accessed below (see section WT/ MIN 913)/ W / 10 - Public Stockholding for Food Security Purposes):



What India has traded away: 

1.Anand Sharma had unambiguously stated that the "peace clause" should be in place till such time that a permanent solution is found. The word "interim" that he had used IS IN the text (a clear victory), but in what is being described by the WTO Secretariat as "constructive ambiguity" the US position that it should be only for four years also finds its place (Para 1) in the text by adding, "for adoption  by the 11th Ministerial Conference" (there is a WTO Ministerial once every two years and Bali was the 9th Ministerial. (Some experts though are interpreting it as being in India's favour since "interim" can be interpreted as holding on till a permanent settlement is found irrespective of the reference to the 11th Ministerial).

District consultation on issues emerging from equity related scoping of livelihood sources and marginalised groups (MADHEPURA)

Right to Food Campaign, organized a consultation on food security and local level livelihood resources on 20th Nov, 2013 in the office of community health and development programme, Madhepura. Participants discussed findings of the study of food security schemes in the district in February, 2013, various provisions of The Food Security Act, vision of the Right to Food campaign, problems affecting Agriculture and farmers, land reforms and corruption in the existing welfare schemes. Around twenty five participants were present there. Important participants, among others, were Ritwij Kumar, Joseph Marandi, Hemant Kumar Yadav, Jai kumar, Akhilesh Saha, Alok kumar Nayak and Pankaj Kumar. Ram lagan Nirala presided over the meeting. The consultation started around 11 AM and concluded at 4 PM.

Global Civil Society letter to Director-General of the WTO

To,

The Director-General of the World Trade Organisation (WTO) and Member States

Do not Dilute G 33 Proposal: Address Imbalance in Global Agricultural Subsidies Rules, Support  Public Stockholding for Guaranteeing Livelihoods and Food Consumption of the Poor at Bali WTO Ministerial.

We, as members of the global civil society, urge the Director-General of the World Trade Organisation, Roberto Azevedo, and member states, to take the issue of food security in developing countries as a matter of serious and immediate concern, and not to render the G-33 proposal on public food stockholding a travesty by asking developing countries to agree to the current text on the peace clause.

Across the developing world, millions of people, most of them poor, still do not have basic and minimum access to food. According to the FAO, 868 million were undernourished in 2011-12, of them 304 million in South Asia and 234 million in Sub Saharan Africa. Even more disturbing is the fact that nearly 3.1 million children under the age of 5 die each year because of poor nutrition (Hunger Statistics, World Food Program 2013).

Right to Food Campaign urges the government to safeguard food sovereignty and food security for all Indians while negotiating at the WTO Bali Ministerial Conference

                                                          Press Release

We urge Government of India to safeguard food sovereignty and food security for all Indians while negotiating at the WTO Bali Ministerial – Protect farmer’s livelihoods and expanded PDS

The Right to Food campaign will also take this issue up with Indian Parliamentarians asking them to raise this in the Parliament as this affects the livelihoods of our farmers and our ability
to fight against hunger


Production, procurement, storage and distribution are all important components of ensuring food security. Unfortunately, in the National Food Security Act (NFSA) the Government took a minimalistic view by focussing only on distribution despite the demands by many for a comprehensive law. Even the minimal entitlements for food given under the NFSA are now under threat because it is claimed that the public procurement to the extent of the foodgrain requirements of the NFSA violate the WTO Agreement on Agriculture (AoA) that India is a part of. Although the NFSA is being blamed, the allocation under the NFSA is only about 3 million tonnes higher than the current amount. This WTO Agreement can be used as an excuse to dismantle or weaken the PDS and replace it with cash transfers.

भोजन का अधिकार अभियान,झार​खंड राज्य सम्मलेन



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Callous Indifferent attitude of Statutory Human Rights Bodies in respect of dealing starvation death and Hunger related issues in Odisha (Few case studies)


Human Rights Bodies like National Human Rights Commission, State Human Rights Commission has been constituted to protect human rights of the people in the country.  As  per  Protection of Human Rights Act,1993,  these  statutory bodies   are required to   hear  the  complaint cases  relating to violation of human rights  and give justice  to the  victims by directing appropriate authority  to take  action against the law violator  and  awarding   compensation to the affected persons.  But the callousness and  indifferent attitude  of  these  bodies  has  endangered  the life and  livelihood  of the  common people  and standing as  stumbling  block  for protection  of human rights. I cite  herewith  few examples  in this regard.